Thursday, 22 September 2011

शहर में 31 रुपए प्रति दिन और गांवों में 25 रुपए प्रति दिन कमाने वाले व्यक्ति गरीब नही


योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफ़नामा दाखिल कर कहा है कि शहरी
क्षेत्रों में 965 रुपए प्रति माह और ग्रामीण क्षेत्र में 781 रुपए प्रति माह
कमाने वाले व्यक्ति को ग़रीब नहीं कहा जा सकता.

ग़रीबी रेखा की सीमा को संशोधित कर योजना आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि शहर
में 31 रुपए प्रति दिन और गांवों में 25 रुपए प्रति दिन कमाने वाले व्यक्ति
को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के योग्य नहीं माना जा सकता.

इससे पहले मॉन्टेक सिंह अहलुवालिया की अगुवाई में योजना आयोग ने ये आंकड़ा
शहरी क्षेत्रों के लिए 20 रुपए और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 15 रुपए
निर्धारित किया था.

लेकिन मई में सुप्रीम कोर्ट ने योजना आयोग की ग़रीबी रेखा की परिभाषा पर
सवालिया निशान लगाते हुए कहा था कि मई 2011 के मूल्य सूचकांक के आधार पर
ग़रीबी रेखा निर्धारित की जाए.

इसके जवाब में योजना आयोग ने तेंदुलकर समिति की रिपोर्ट पर आधारित संशोधित
सीमा तैयार की है.

नए मानदंड के मुताबिक़ शहर मे रहने वाला पांच सदस्यों का परिवार अगर महीने
में 4,824 रुपए कमाता है, तो उसे कल्याणकारी योजनाओं के लिए योग्य नहीं कहा
जा सकता. वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवार के लिए मासिक 3,905
रुपए कमाना उन्हें ग़रीबी रेखा के ऊपर की सूची में लाने के लिए काफ़ी होगा.

इसका मतलब इतनी कमाई इन परिवारों की खाद्य, चिकित्सकीय और शैक्षणिक ज़रूरतों
को पूरा करने के लिए पर्याप्त होगी.

योजना आयोग का कहना है कि ये आंकड़े श्रमिकों और कृषिकों के लिए बनाए गए
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित हैं.
आलोचना

कई विश्लेषकों का कहना है कि मासिक कमाई पर ग़रीबी रेखा के आंकड़ें तय करना
जायज़ नहीं है.

विश्लेषकों का कहना है कि योजना आयोग की ओर से निर्धारित किए गए ये आंकड़े
भ्रामक हैं और ऐसा लगता है कि आयोग का मक़सद ग़रीबों की संख्या को घटाना है
ताकि कम लोगों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का फ़ायदा देना पड़े.

भारत में ग़रीबों की संख्या पर विभिन्न अनुमान हैं. आधिकारिक आंकड़ों की
मानें, तो भारत की 37 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे है. जबकि एक दूसरे
अनुमान के मुताबिक़ ये आंकड़ा 77 प्रतिशत हो सकता है.

भारत में महंगाई दर में पिछले एक साल में लगातार बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है.

कई विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे में मासिक कमाई पर ग़रीबी रेखा के आंकड़ें
तय करना जायज़ नहीं है.

योजना आयोग ने अपने हलफ़नामे में ये भी कहा है कि भारत में 36 करोड़ की आबादी
को सस्ते दामों में खाद्य और घरेलू ईंधन दिया जाता है.

मई में विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में सामने आया था कि ग़रीबी से लड़ने के लिए
भारत सरकार के प्रयास पर्याप्त साबित नहीं हो पा रहं हैं.

रिपोर्ट में कहा गया था कि भ्रष्टाचार और प्रभावहीन प्रबंधन की वजह से
ग़रीबों के लिए बनी सरकारी योजनाएं सफल नहीं हो पाई हैं.

ग़ौरतलब है कि योजना आयोग के हलफ़नामे को सुप्रीम कोर्ट में दायर करने से
पहले इसे प्रधानमंत्री कार्यालय की मंज़ूरी दी गई थी.

योजना आयोग का कहना है कि अंतिम ग़रीबी रेखा के मानदंड 2011-12 के नेशनल
सैंपल सर्वे के परिणाम सामने आने के बाद जारी किया जाएगा.
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